Friday, October 21, 2022

बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ

  बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ

बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ,
मुझे इस नरक से निकालो।

आपकी उँगली पकड़ कर चली हूँ,
आज बेशुद पड़ी हूँ ।

मैं नहीं जानती ये खोखली दुनिया की सोच को,
यहां तो बाज़ार लगता है,बोली लगा के नोंच लो।

समाज के मूक दर्शक से भी कोई लाज़ नही बचाता,
तमाशा देखते ठहाके लगा के हमदर्दी जगाता।

मैं नादान थी जो इस देश में जन्मी,
यहां तो सीता मैया को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी।

क्या ग़ुनाह हुई हमसे जो ये हादसा के कसूरवार हम हो गए,
शर्म -हया के जंजीरों में खुशियां ही दफ़न हो गए।

जिंदगी के चौराये पर चरित्र से ही हमें परखा जाता है,
विवाह तो दूर हमें कोई अपने साथ नहीं रखना चाहता है।

गरीबी से कब का हार चुके,
अमीरों के ग़ुलामी हो चुके।

माता को पुजते है नवरात्रों में जय हो,
हमारे अत्याचारों पर निःशब्द होते हो।

अब जीने की कोई तमन्ना नहीं रही,
इस दर्द से ऊब चुकी अब चेन से सो रही।

मेरे जाने के बाद मेरे लिए इंसाफ़ की लड़ाई नहीं लड़ना,
हर नारी को माँ, बहन और कुटुम्ब की नज़रों से देखना।

घुमनाम हो जाऊँगी मैं एक दिन पर भूल नहीं करना,
किसी अबला के दामन को खिलौना नहीं समझना।
 
बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ,
मुझे इस नरक से निकालो।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद