Friday, December 10, 2021

मशिय्यत

मशिय्यत

यूँ तो तकलीफ़ भी  है आपसे, 
यूँ तो हमदर्दी भी है आपसे।
माना आप में वो दाग नहीं, 
क्यानात में अब तक कोई आपसा नहीं।।

कुर्दे करोगे जब तुम मेरा सीना,
सोचोगी क्यों इस तरह है जीना।
मिलने के लिए दुआं कर लूं,
बेजुबान बन के तेरे संग रह लूं।।

दफ़न ना होगी हमारी यादें,
अगर हासिल होगी पूरी वादें।
मिटने को तो त्यार है हम, 
चाए जख्म ना होगा कम।।

गुनाह करते जो इश्क में पड़ते,
है जुनून जो जमाने से लड़ते। 
ना रह पाहोगी मेरे बिना तुम,
तेरी दिल के बिना ये दिल हो जायेगा घूम।।

आओ लिखते है अपनी इतिहास को,
जानेंगे जानकर हमारे प्रेम के विश्वास को।
जिंदगी कट जाएगी अगर साथ तुम हो,
ऐ हमसफ़र तेरी जुबान में अगर हां हो।।

लेखक
अंकित शेखर
धनबाद

Thursday, October 28, 2021

दिलों के दीप

दिलों के दीप

हो रहा है रौशन आँगन मेरा,
घट रहा है रातों का अंधेरा।
करो तैयारी हम सब लगा के डेरा,
जगमग दीपों से लगे सुनहरा।

पटाखे, फुलझड़ियाँ से बच्चें जश्न मनाते,
मिठाइयां की खुशबू में ड़ूब जाते।
लष्मी - गणेश की पूजा करते,
एक दूसरे के घर हम जाते।

रंग-भिरंगें झालरों से सजा घरौंदा मेरा,
रंगोली, अल्पना से गुलशन हुआ घर मेरा।
व्यापारियों का सामान खूब बिका,
मीठी पकवानों का स्वाद सबने चका,


ऐसा अनोखा दिन पहले नहीं आता,
ये अमावस्या बुराइयों को ले जाता।
उच्च-नीच का भेदभाव को मिटाता
दीपक की लो से दिलों को मिलाता

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Saturday, May 1, 2021

मानो तो मैं हूँ

मानो तो मैं हूँ।

आसमान से उतारकर, 
देखो कोई फ़रिश्ता आया है।
ले जाने मुझे अपनी ओर,
मेरा प्रिय सखा आया है।।

हंस पे बैठ के,
भ्रमण करने को निकला।
सरोवर में  प्रतिबिंब पड़ा,
शांत उपवन में वह चला।।

विशाल वृक्ष की छावं पर,
थोड़ा विश्राम हो लिए।
फूलों की पंखुड़ियां बिखर के,
बेशुद हो के चैन से सो लिए।।

शाम की दस्तक़ से,
घर की ओर चल दिए।
साया बन के वह,
कंकरों को ही हटा दिए।।

भूख से  त्राहि-त्राहि में,
फलों की करतार सज जाए।
प्यास मन से बुझा दे,
जैसे तृप्त हो जाए।।

उदास हो के जब, 
अकेला पड़ जाए।
''मैं हूँ'' कह के,
फिर सूक्ष्म हो जाए।।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Friday, April 23, 2021

मैं मज़दूर मुझमें और जान बाक़ी हैं।

मैं मज़दूर मुझमें और जान बाक़ी है।

चल पड़े नंगे पांव से,
ढूंढ रहे नए ठिकानों से।
धूप की तपिश में तपना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

महलों, घरों को बनाते है,
खुद कुटिया में रह जाते है।
ईठ-ईठ को सर पे ढोना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

परिवार क्या होता कोई मुझसे पूछो,
त्यौहारों में गली-गली काम के लिए सोचो।
छोटी खुशियों से परिवार को पालना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

नहीं द्वेष रखते है,नहीं लालच मन में,
ईमानदारी, ख़ुदारी सीखा है बचपन में।
चोट,हादसों से नहीं कोई विचलित होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

पहाड़ो को काटते है,रास्ते को बनाते है,
कोई आ के देखो हम जीवन कैसे गुज़ारते हैं।
लोहा-औज़ारों से ही जीवन चलाना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद


Thursday, April 22, 2021

दिल का आईना

दिल का आईना

लिख चुका है नसीब में जो सज़ा,
अब नहीं हैं जीने की कोई वज़ह।
संवारने चले थे अपने आलम को,
साथी दे गया इस गम को।

आवाज़ की गूँज स्पर्श किया करती,
बेज़ान शव में हलचल हुआ करती।
ग़ुनाह हुई जो जज़्बात को दिखाया,
हमने खुद तलवारों की नोंक पर सर झुकाया।

बेहद क़रीब थी हसरतें भी अपनी,
रुसवाई से कफ़न बन गयी अपनी।
रगों से निकला रंग भी लाल था,
जो ले जाने आया वो काल था।

पिगल रही थी लौ मोमबत्ती की,
नज़रों से उसने नुमाइश की।
तसल्ली थी कि हार से जी गए,
नाराज़गी में कसूरवार हम हो गए।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Friday, April 9, 2021

वो दौर चले गए

वो दौर चले गए

बीती लहरें भी चली गई,
एक दिन में बिछड़ गई।
बरसों से जुड़ाव थी जिनकी,
वो दौर ही सिमट गई।।

गुलशन थी बहारों में,
कोई फूल थी गलियारों में।
महकने थी उसकी खुश्बू को,
और खिलना थी एक नई उषा को।।

पतंग की दौड़ में फिसलना नहीं,
ऊँचाई हो जितनी समालना नहीं।
रोज़ की दिनचर्या बीतती घंटियों में,
सीखतें नया हम खेल-खेल में।।

रात्रि में जुगनू से रोशनी होती,
चाँद पे जाने की आस होती।
छूते हर उन तारों को सब में,
जो छिप चुका है घने मेघों में।।

बोझ इतनी सी की उठा लेते,
चुपके से मिठाइयां चुरा लेते।
गलती में डाट पड़ते,
दोबारा वही काम करते।।

सर्दी और बरसात सुहावने होती,
गर्मी की छुट्टियाँ होती।
दूरदर्शन पे मनोरंजन करते,
हँसते हुए दिन गुज़रते।।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Thursday, April 8, 2021

मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ

मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ।

तुझको तंग करके,
मैं पर्दे में चुप जाऊँ।
धीरे-धीरे तुम मुझको,
ढूंढ़ने के लिये आओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ,
मेरे बिना तुम नहीं रह पाओ।।

खेल-खुद संग खेलके,
मैं चोट से रो जाऊँ।
पास तुम गोद में लेके,
मुझको थपकी देखे चुप कराओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ,
मेरे बिना तुम नहीं रह पाओ।।

होली के रंग से,दीवाली के दीपों से,
मैं सदा खुश हो जाऊँ।
रिश्तों के त्योहारों में,रक्षा के लिए,
धागा को बाँध कर बँधन में बन जाओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ,
मेरे बिना तुम नहीं रह पाओ।।

उम्र के इस पड़ाव में,
विवाह के लिए तैयार हो जाऊँ।
बिदाई देके तुम इस पल में,
सब नाता तोड़ जाओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ
मेरे बिना तुम नही रह पाओ।।

Monday, February 1, 2021

Emptiness of love

Emptiness of love

An emotion blinds a love
An inspiration shows a love
Feel the pain
Regret the past
Firm the essence of love

Before you and I
Shouldn't allow to be shy
Being a mine
Makes the life shine

Dive into deepness of love
Fly over boundless of love
Break the boundaries
Sustain the upbringing
Abode in the fragnance of love

Distances hurts heartily
Ties a relation tightly
Holding hands, breath with you
Closing eyes , ends with you

Poet✍
Ankit Shekhar
Dhanbad

मैं कौन हूँ

मैं कौन हूँ , किसको क्या पता है,
भुज गया है दीपक,किसका है जला।
अधूरी सी मुलाकातें,
अनकही सी बातें,
यारा तू बता दे कसूर क्या है।।

आंखों से गिरते है, आँशु रुखते नहीं,
बह जाते है भावना में, लोग समालते नहीं।
रब भी रूठा है,
साथी छूटा है,
सारे कहते है ये लड़का झूठा है।।

जीना भी क्या है ,मौत लगा लूँ गले,
आईना के जैसा, साफ होते है सबके मन भले।
अपनो ने छोड़ा है,
ग़ैरों ने अपनाया है,
क़दर ना होती उनकी जिसने मोहब्बत को ठुकराया है।।

मैं कौन हूँ , किसको क्या पता है,
भुज गया है , दीपक किसका है जला।
अधूरी सी मुलाकाते,
अनकही सी बातें,
यारा तू बता दे कसूर क्या है।।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद