Friday, April 23, 2021

मैं मज़दूर मुझमें और जान बाक़ी हैं।

मैं मज़दूर मुझमें और जान बाक़ी है।

चल पड़े नंगे पांव से,
ढूंढ रहे नए ठिकानों से।
धूप की तपिश में तपना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

महलों, घरों को बनाते है,
खुद कुटिया में रह जाते है।
ईठ-ईठ को सर पे ढोना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

परिवार क्या होता कोई मुझसे पूछो,
त्यौहारों में गली-गली काम के लिए सोचो।
छोटी खुशियों से परिवार को पालना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

नहीं द्वेष रखते है,नहीं लालच मन में,
ईमानदारी, ख़ुदारी सीखा है बचपन में।
चोट,हादसों से नहीं कोई विचलित होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

पहाड़ो को काटते है,रास्ते को बनाते है,
कोई आ के देखो हम जीवन कैसे गुज़ारते हैं।
लोहा-औज़ारों से ही जीवन चलाना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद


Thursday, April 22, 2021

दिल का आईना

दिल का आईना

लिख चुका है नसीब में जो सज़ा,
अब नहीं हैं जीने की कोई वज़ह।
संवारने चले थे अपने आलम को,
साथी दे गया इस गम को।

आवाज़ की गूँज स्पर्श किया करती,
बेज़ान शव में हलचल हुआ करती।
ग़ुनाह हुई जो जज़्बात को दिखाया,
हमने खुद तलवारों की नोंक पर सर झुकाया।

बेहद क़रीब थी हसरतें भी अपनी,
रुसवाई से कफ़न बन गयी अपनी।
रगों से निकला रंग भी लाल था,
जो ले जाने आया वो काल था।

पिगल रही थी लौ मोमबत्ती की,
नज़रों से उसने नुमाइश की।
तसल्ली थी कि हार से जी गए,
नाराज़गी में कसूरवार हम हो गए।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Friday, April 9, 2021

वो दौर चले गए

वो दौर चले गए

बीती लहरें भी चली गई,
एक दिन में बिछड़ गई।
बरसों से जुड़ाव थी जिनकी,
वो दौर ही सिमट गई।।

गुलशन थी बहारों में,
कोई फूल थी गलियारों में।
महकने थी उसकी खुश्बू को,
और खिलना थी एक नई उषा को।।

पतंग की दौड़ में फिसलना नहीं,
ऊँचाई हो जितनी समालना नहीं।
रोज़ की दिनचर्या बीतती घंटियों में,
सीखतें नया हम खेल-खेल में।।

रात्रि में जुगनू से रोशनी होती,
चाँद पे जाने की आस होती।
छूते हर उन तारों को सब में,
जो छिप चुका है घने मेघों में।।

बोझ इतनी सी की उठा लेते,
चुपके से मिठाइयां चुरा लेते।
गलती में डाट पड़ते,
दोबारा वही काम करते।।

सर्दी और बरसात सुहावने होती,
गर्मी की छुट्टियाँ होती।
दूरदर्शन पे मनोरंजन करते,
हँसते हुए दिन गुज़रते।।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Thursday, April 8, 2021

मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ

मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ।

तुझको तंग करके,
मैं पर्दे में चुप जाऊँ।
धीरे-धीरे तुम मुझको,
ढूंढ़ने के लिये आओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ,
मेरे बिना तुम नहीं रह पाओ।।

खेल-खुद संग खेलके,
मैं चोट से रो जाऊँ।
पास तुम गोद में लेके,
मुझको थपकी देखे चुप कराओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ,
मेरे बिना तुम नहीं रह पाओ।।

होली के रंग से,दीवाली के दीपों से,
मैं सदा खुश हो जाऊँ।
रिश्तों के त्योहारों में,रक्षा के लिए,
धागा को बाँध कर बँधन में बन जाओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ,
मेरे बिना तुम नहीं रह पाओ।।

उम्र के इस पड़ाव में,
विवाह के लिए तैयार हो जाऊँ।
बिदाई देके तुम इस पल में,
सब नाता तोड़ जाओ।
ओ भैया! मालूम हो मैं तेरी परछाई हूँ
मेरे बिना तुम नही रह पाओ।।