चल पड़े नंगे पांव से,
ढूंढ रहे नए ठिकानों से।
धूप की तपिश में तपना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।
महलों, घरों को बनाते है,
खुद कुटिया में रह जाते है।
ईठ-ईठ को सर पे ढोना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।
परिवार क्या होता कोई मुझसे पूछो,
त्यौहारों में गली-गली काम के लिए सोचो।
छोटी खुशियों से परिवार को पालना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।
नहीं द्वेष रखते है,नहीं लालच मन में,
ईमानदारी, ख़ुदारी सीखा है बचपन में।
चोट,हादसों से नहीं कोई विचलित होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।
पहाड़ो को काटते है,रास्ते को बनाते है,
कोई आ के देखो हम जीवन कैसे गुज़ारते हैं।
लोहा-औज़ारों से ही जीवन चलाना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।
लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद