Tuesday, November 8, 2022

bio

अंकित शेखर(लेखक),धनबाद(झारखंड)।इनका जन्म 19 फरवरी 1993 को हआ है। इन्होंने अंग्रेजी विषय से स्नातक किया है।इन्होंने सरकारी महाविधलय से कंप्यूटर साइंस से अभियंता की डिप्लोमा भी किया है।इनकी रुचि लिखने की ओर हमेशा से रही है।इन्होंने बहत सारे गाने,शायर्, कविता लिखे है,उनमे से करीब बहुत से कविताओं के संग्रह में कविता दे चुके है।अभी  इनका यही सपना है की इनके कविताएं से  लोग जुड़ सके और सम्मान करे।


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Friday, October 21, 2022

बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ

  बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ

बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ,
मुझे इस नरक से निकालो।

आपकी उँगली पकड़ कर चली हूँ,
आज बेशुद पड़ी हूँ ।

मैं नहीं जानती ये खोखली दुनिया की सोच को,
यहां तो बाज़ार लगता है,बोली लगा के नोंच लो।

समाज के मूक दर्शक से भी कोई लाज़ नही बचाता,
तमाशा देखते ठहाके लगा के हमदर्दी जगाता।

मैं नादान थी जो इस देश में जन्मी,
यहां तो सीता मैया को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी।

क्या ग़ुनाह हुई हमसे जो ये हादसा के कसूरवार हम हो गए,
शर्म -हया के जंजीरों में खुशियां ही दफ़न हो गए।

जिंदगी के चौराये पर चरित्र से ही हमें परखा जाता है,
विवाह तो दूर हमें कोई अपने साथ नहीं रखना चाहता है।

गरीबी से कब का हार चुके,
अमीरों के ग़ुलामी हो चुके।

माता को पुजते है नवरात्रों में जय हो,
हमारे अत्याचारों पर निःशब्द होते हो।

अब जीने की कोई तमन्ना नहीं रही,
इस दर्द से ऊब चुकी अब चेन से सो रही।

मेरे जाने के बाद मेरे लिए इंसाफ़ की लड़ाई नहीं लड़ना,
हर नारी को माँ, बहन और कुटुम्ब की नज़रों से देखना।

घुमनाम हो जाऊँगी मैं एक दिन पर भूल नहीं करना,
किसी अबला के दामन को खिलौना नहीं समझना।
 
बाबा मैं आपकी ही बेटियां हूँ,
मुझे इस नरक से निकालो।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Friday, December 10, 2021

मशिय्यत

मशिय्यत

यूँ तो तकलीफ़ भी  है आपसे, 
यूँ तो हमदर्दी भी है आपसे।
माना आप में वो दाग नहीं, 
क्यानात में अब तक कोई आपसा नहीं।।

कुर्दे करोगे जब तुम मेरा सीना,
सोचोगी क्यों इस तरह है जीना।
मिलने के लिए दुआं कर लूं,
बेजुबान बन के तेरे संग रह लूं।।

दफ़न ना होगी हमारी यादें,
अगर हासिल होगी पूरी वादें।
मिटने को तो त्यार है हम, 
चाए जख्म ना होगा कम।।

गुनाह करते जो इश्क में पड़ते,
है जुनून जो जमाने से लड़ते। 
ना रह पाहोगी मेरे बिना तुम,
तेरी दिल के बिना ये दिल हो जायेगा घूम।।

आओ लिखते है अपनी इतिहास को,
जानेंगे जानकर हमारे प्रेम के विश्वास को।
जिंदगी कट जाएगी अगर साथ तुम हो,
ऐ हमसफ़र तेरी जुबान में अगर हां हो।।

लेखक
अंकित शेखर
धनबाद

Thursday, October 28, 2021

दिलों के दीप

दिलों के दीप

हो रहा है रौशन आँगन मेरा,
घट रहा है रातों का अंधेरा।
करो तैयारी हम सब लगा के डेरा,
जगमग दीपों से लगे सुनहरा।

पटाखे, फुलझड़ियाँ से बच्चें जश्न मनाते,
मिठाइयां की खुशबू में ड़ूब जाते।
लष्मी - गणेश की पूजा करते,
एक दूसरे के घर हम जाते।

रंग-भिरंगें झालरों से सजा घरौंदा मेरा,
रंगोली, अल्पना से गुलशन हुआ घर मेरा।
व्यापारियों का सामान खूब बिका,
मीठी पकवानों का स्वाद सबने चका,


ऐसा अनोखा दिन पहले नहीं आता,
ये अमावस्या बुराइयों को ले जाता।
उच्च-नीच का भेदभाव को मिटाता
दीपक की लो से दिलों को मिलाता

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Saturday, May 1, 2021

मानो तो मैं हूँ

मानो तो मैं हूँ।

आसमान से उतारकर, 
देखो कोई फ़रिश्ता आया है।
ले जाने मुझे अपनी ओर,
मेरा प्रिय सखा आया है।।

हंस पे बैठ के,
भ्रमण करने को निकला।
सरोवर में  प्रतिबिंब पड़ा,
शांत उपवन में वह चला।।

विशाल वृक्ष की छावं पर,
थोड़ा विश्राम हो लिए।
फूलों की पंखुड़ियां बिखर के,
बेशुद हो के चैन से सो लिए।।

शाम की दस्तक़ से,
घर की ओर चल दिए।
साया बन के वह,
कंकरों को ही हटा दिए।।

भूख से  त्राहि-त्राहि में,
फलों की करतार सज जाए।
प्यास मन से बुझा दे,
जैसे तृप्त हो जाए।।

उदास हो के जब, 
अकेला पड़ जाए।
''मैं हूँ'' कह के,
फिर सूक्ष्म हो जाए।।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद

Friday, April 23, 2021

मैं मज़दूर मुझमें और जान बाक़ी हैं।

मैं मज़दूर मुझमें और जान बाक़ी है।

चल पड़े नंगे पांव से,
ढूंढ रहे नए ठिकानों से।
धूप की तपिश में तपना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

महलों, घरों को बनाते है,
खुद कुटिया में रह जाते है।
ईठ-ईठ को सर पे ढोना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

परिवार क्या होता कोई मुझसे पूछो,
त्यौहारों में गली-गली काम के लिए सोचो।
छोटी खुशियों से परिवार को पालना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

नहीं द्वेष रखते है,नहीं लालच मन में,
ईमानदारी, ख़ुदारी सीखा है बचपन में।
चोट,हादसों से नहीं कोई विचलित होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

पहाड़ो को काटते है,रास्ते को बनाते है,
कोई आ के देखो हम जीवन कैसे गुज़ारते हैं।
लोहा-औज़ारों से ही जीवन चलाना होगा,
पेट के लिए कमाना होगा।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद


Thursday, April 22, 2021

दिल का आईना

दिल का आईना

लिख चुका है नसीब में जो सज़ा,
अब नहीं हैं जीने की कोई वज़ह।
संवारने चले थे अपने आलम को,
साथी दे गया इस गम को।

आवाज़ की गूँज स्पर्श किया करती,
बेज़ान शव में हलचल हुआ करती।
ग़ुनाह हुई जो जज़्बात को दिखाया,
हमने खुद तलवारों की नोंक पर सर झुकाया।

बेहद क़रीब थी हसरतें भी अपनी,
रुसवाई से कफ़न बन गयी अपनी।
रगों से निकला रंग भी लाल था,
जो ले जाने आया वो काल था।

पिगल रही थी लौ मोमबत्ती की,
नज़रों से उसने नुमाइश की।
तसल्ली थी कि हार से जी गए,
नाराज़गी में कसूरवार हम हो गए।

लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद