भुज गया है दीपक,किसका है जला।
अधूरी सी मुलाकातें,
अनकही सी बातें,
यारा तू बता दे कसूर क्या है।।
आंखों से गिरते है, आँशु रुखते नहीं,
बह जाते है भावना में, लोग समालते नहीं।
रब भी रूठा है,
साथी छूटा है,
सारे कहते है ये लड़का झूठा है।।
जीना भी क्या है ,मौत लगा लूँ गले,
आईना के जैसा, साफ होते है सबके मन भले।
अपनो ने छोड़ा है,
ग़ैरों ने अपनाया है,
क़दर ना होती उनकी जिसने मोहब्बत को ठुकराया है।।
मैं कौन हूँ , किसको क्या पता है,
भुज गया है , दीपक किसका है जला।
अधूरी सी मुलाकाते,
अनकही सी बातें,
यारा तू बता दे कसूर क्या है।।
लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद
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