मानो तो मैं हूँ।
देखो कोई फ़रिश्ता आया है।
ले जाने मुझे अपनी ओर,
मेरा प्रिय सखा आया है।।
हंस पे बैठ के,
भ्रमण करने को निकला।
सरोवर में प्रतिबिंब पड़ा,
शांत उपवन में वह चला।।
विशाल वृक्ष की छावं पर,
थोड़ा विश्राम हो लिए।
फूलों की पंखुड़ियां बिखर के,
बेशुद हो के चैन से सो लिए।।
शाम की दस्तक़ से,
घर की ओर चल दिए।
साया बन के वह,
कंकरों को ही हटा दिए।।
भूख से त्राहि-त्राहि में,
फलों की करतार सज जाए।
प्यास मन से बुझा दे,
जैसे तृप्त हो जाए।।
उदास हो के जब,
अकेला पड़ जाए।
''मैं हूँ'' कह के,
फिर सूक्ष्म हो जाए।।
लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद
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