हो रहा है रौशन आँगन मेरा,
घट रहा है रातों का अंधेरा।
करो तैयारी हम सब लगा के डेरा,
जगमग दीपों से लगे सुनहरा।
पटाखे, फुलझड़ियाँ से बच्चें जश्न मनाते,
मिठाइयां की खुशबू में ड़ूब जाते।
लष्मी - गणेश की पूजा करते,
एक दूसरे के घर हम जाते।
रंग-भिरंगें झालरों से सजा घरौंदा मेरा,
रंगोली, अल्पना से गुलशन हुआ घर मेरा।
व्यापारियों का सामान खूब बिका,
मीठी पकवानों का स्वाद सबने चका,
ऐसा अनोखा दिन पहले नहीं आता,
ये अमावस्या बुराइयों को ले जाता।
उच्च-नीच का भेदभाव को मिटाता
दीपक की लो से दिलों को मिलाता
लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद
No comments:
Post a Comment