दिल का आईना
लिख चुका है नसीब में जो सज़ा,
अब नहीं हैं जीने की कोई वज़ह।
संवारने चले थे अपने आलम को,
साथी दे गया इस गम को।
आवाज़ की गूँज स्पर्श किया करती,
बेज़ान शव में हलचल हुआ करती।
ग़ुनाह हुई जो जज़्बात को दिखाया,
हमने खुद तलवारों की नोंक पर सर झुकाया।
बेहद क़रीब थी हसरतें भी अपनी,
रुसवाई से कफ़न बन गयी अपनी।
रगों से निकला रंग भी लाल था,
जो ले जाने आया वो काल था।
पिगल रही थी लौ मोमबत्ती की,
नज़रों से उसने नुमाइश की।
तसल्ली थी कि हार से जी गए,
नाराज़गी में कसूरवार हम हो गए।
लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद
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