हमें बदनाम यूँ ना करो
कोई शर्मिंदगी पे हँसने लगेगा
कसम की दुहाई देगा
शराफत का बाजार लगेगा
ये तमाशा का रंग गहरा होगा
ईमान के लिए पहरा होगा
करो नफरत इस कदर
की लो के आग में जलना होगा
बेबस,लाचार का सितम होगा
पुरानी सोच का आदेश होगा
मंजूरी हो सहने की
मौसम में जोरदार ठनका होगा
क्या हुआ यादें में चोट होगा
दर्द की महसूस का सदा ऐसहस होगा
नाराजगी पे चुनाव होगा
फैसला पे अमल होगा
हमें बादाम यूँ ना करो
कोई शर्मिंदगी पे हँसने लगेगा।
लेखक
अंकित शेखर
धनबाद
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