Thursday, November 28, 2019

हमें बदनाम यूँ ना करो

हमें बदनाम यूँ ना करो
कोई शर्मिंदगी पे हँसने लगेगा

कसम की दुहाई देगा
शराफत का बाजार लगेगा

ये तमाशा का रंग गहरा होगा
ईमान के लिए पहरा होगा

करो नफरत इस कदर
की लो के आग में जलना होगा

बेबस,लाचार का सितम होगा
पुरानी सोच का आदेश होगा

मंजूरी हो सहने की 
मौसम में जोरदार ठनका होगा

क्या हुआ यादें में चोट होगा
दर्द की महसूस का सदा ऐसहस होगा

नाराजगी पे चुनाव होगा
फैसला पे अमल होगा

हमें बादाम यूँ ना करो
कोई शर्मिंदगी पे हँसने लगेगा।

लेखक
अंकित शेखर
धनबाद

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