वो दौर चले गए
एक दिन में बिछड़ गई।
बरसों से जुड़ाव थी जिनकी,
वो दौर ही सिमट गई।।
गुलशन थी बहारों में,
कोई फूल थी गलियारों में।
महकने थी उसकी खुश्बू को,
और खिलना थी एक नई उषा को।।
पतंग की दौड़ में फिसलना नहीं,
ऊँचाई हो जितनी समालना नहीं।
रोज़ की दिनचर्या बीतती घंटियों में,
सीखतें नया हम खेल-खेल में।।
रात्रि में जुगनू से रोशनी होती,
चाँद पे जाने की आस होती।
छूते हर उन तारों को सब में,
जो छिप चुका है घने मेघों में।।
बोझ इतनी सी की उठा लेते,
चुपके से मिठाइयां चुरा लेते।
गलती में डाट पड़ते,
दोबारा वही काम करते।।
सर्दी और बरसात सुहावने होती,
गर्मी की छुट्टियाँ होती।
दूरदर्शन पे मनोरंजन करते,
हँसते हुए दिन गुज़रते।।
लेखक✍
अंकित शेखर
धनबाद
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